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सफलता की राह की बाधाएँ : इनसे कैसे बचें ?

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Written by Nitin Gupta

नमस्कार दोस्तो 🙂 

आज की इस पोस्ट में हम आपको हमारी सफ़लता की राह में आ सकने बाली बाधाओं के बारे में बात करेंगे ! ये वो बाधाऐं हैं जो सभी व्यक्तियों के जीबन में आती हैं ! और साथ ही इन बाधाओं से किस प्रकार बचा जाये इसके बारें में चर्चा करेंगे जिससे कि आप इन बाधाओं को पार करके अपने जीबन में सफ़लता को प्राप्त कर पाऐंगे ! 🙂 

तो चलिये दोस्तो शुरु करते हैं ! 

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नकारात्‍मक लोग

हमने बार-बार लिखा है कि सफलता की राह सरल नहीं है, उसमें कई प्रकार की बाधाऍं आती हैं। आपको जीवन में बहुत-से नकारात्‍मक लोग मिलेंगे। ये लोग ऐसे लोग है, जिन्होंने स्‍वयं जीवन में कोई ठोस कार्य नहीं किया एवं जब दूसरे लोग कुछ करना चाहते है, तो कई प्रकार के उदाहरण देकर, आपको आगे बढ़ने से रोकते हैं। निराशा की बातें करते हैं, असफलता का डर दिखाते हैं एवं आपको अपने मार्ग से हटाकर कुद अन्‍य करने को प्रेरित करते हैं। ऐसे लोग आपके आसपास आपके मित्र बने हुए, आपके रिश्‍तेदार, पड़ोस में मिल जाऍंगे।

वे स्‍वयं कर्महीन होते हैं, औसत से भी निम्‍न स्‍तर की सोच एवं जीवन-स्‍तर होता है, लेकिन आपके सगे बनकर आपको अपने लक्ष्‍य से दूर करने का कुत्सित प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों से हर हाल मे ंबचें। प्रयास करें कि आप उनके अधिक सम्‍पर्क में नहीं आऍं। जब भी वे कोई नकारात्‍मक बात करें, कोई सुझाव दें, तो उसी समय उन्‍हें रोक दें या कोई-न-कोई कारण बताकर वहॉं से उठ जाऍं। नकारात्‍मक बातों का व्‍यक्ति की इच्‍छाशक्ति एवं आत्‍मविश्‍वास पर, बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

आप किसी भी व्‍यवसाय में, नौकरी में हों या किसी अन्‍य प्रो‍फेशन में, ऐसे लोगों का उद्देश्‍य आपको लक्ष्‍य से हटाकर किसी अन्‍य झमेले में उलझाना है। गलत बात कहकर, किसी अन्‍य की बुराई करके, कोई अन्‍य इस प्रकार की बात करके, आपको उकसाना, किसी के साथ उलझाना, इनका तरीका होता है। जब इनका कोई काम अटका होता है, तो ये बहुत मीठे होते हैं अन्‍यथा इनकी प्रवृत्ति दुष्‍ट लोगों जैसी होती है। ऐसे लोगों से उलझना भी नहीं चाहिए, बल्कि उनकी इस तरण से उपेक्षा करें कि बुरा भी न लगे।

मार्शल आर्ट का िएक नियम है कि जब कोई हम पर हमला करें, तो उसे रोकने की बजाय दूर हट जाऍं। रोकने में जो ऊर्जा व्‍यय होती है, उसे सकारात्‍मक कार्यो में लक्ष्‍य संधारण में, सफलता अर्जित करने में करें।

”ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो आपकी रुचि को तो नकारते हैं और उल्‍टे-सीधे सुझाव देकर, आपको मार्गच्‍युत् करना चाहते हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्‍होंने स्‍वयं के जीवन में कुछ नहीं किया और वे दूसरों को भी कुछ करते देखना नहीं चाहते।”

झूठे प्रशंसक

हर व्‍यक्ति को अपनी प्रशंसा प्रिय लगती है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति चाहता है कि उसकी प्रशंसा हो, लोग उसके कार्यों की प्रशंसा करें, लेकिन यदि यह प्रशंसा सत्‍य नहीं है, झूठी है तो यह बहुत खतरनाक है। झूठी प्रशंसा करने वाले लोग, आपके वास्‍तविक मित्र नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे लोग हैं, जो या तो आपसे गलत लाभ उठाना चाहते हैं या वो आपके नजदीक आकर, अन्‍य की नज़रों में स्‍वयं को श्रेष्‍ठ साबित करना चाहते हैं।

बहुत से लाग इस झूठी प्रशंसा करने में, चापलूसी करने में बहुत माहिर होते हैं। वे व्‍यक्ति की इस कमज़ोरी को , कि प्रशंसा सबको प्रिय है, जानते हैं और वही बात बोलते हैं, जो आपको पसन्‍द है। झूठी प्रशंसा एक ऐसा बिष है, जो आपकी प्रतिभा का दुश्‍मन है। झूठी प्रशंसा पसन्‍द करने वाला व्‍यक्ति, कुछ ऐसे चापलूसों के चंगुल में फँस जाता है कि वह अच्‍छे कार्यकर्ताओं, अच्‍छे मित्रों, वास्‍तविक वफादार लोगों से धीरे-धीरे दूर होता जाता है और ऐसे चापलूसों से घिरा रहता है, जो आपका नहीं, बल्कि स्‍वयं का हित ही देखते हैं। वे बातें तो ऐसी मधुर व मीठी करते हैं कि आप प्रसन्‍न रहते हैं, अन्‍दर से वे लोग आपके हित में कभी नहीं सोचते। वे आपको सभी मार्ग से पथ भ्रष्‍ट कर सकते हैं। आपको धोखा दे सकते हैं, आपको कोई भी आर्थिक व सामाजिक नुकसान पहुँचा सकते हैं।

ऐसे लोगों से हर हालत में बचना चाहिए। ऐसे लोग आपकी वा‍स्‍तविक अफलता में आने वाली बहुत बड़ी बाधा स्‍वरूप होते हैं।

ऐसे लोगों से सावधान रहें। इसके लिए आप निम्‍न तरीके अपना सकते हैं- जब भी कोई आपकी प्रशंसा करे, तो आप उस कार्य के लिए अपने सहर्मियों को जिम्‍मेदार बनाकर, वह प्रशंसा उनके नाम कर दें।साथ ही कुछ ऐसे मित्र भी अपने साथ जोड़ें, जो सही को सही एवं गलत को गलत कहें। ऐसे मित्रों को पूरा समर्थ प्रदान करें। आप चैतन्‍य रहें, जागरूक रहें। ऐसे लोगों पर, जो झूठे प्रशंसक हैं, कड़ी निगरानी रखें। देखें कि कहीं ये लोग कोई चालाकी या चतुराई करके, कोई नुकसान तो नहीं पहुँचा नहे हैं।

जीवन में अवसरों का आवागमन होता ही रहता है। आपके दरवाजे पर अवसरों की दस्‍तक सुनाई देती रहती है। जरूरी है कि आप उचित अवसर को पहचानें एवं उसे पकड़कर, लाभ उठाएँ। इसके लिये आवश्‍यक है कि आप दूरदर्शिता से काम लें, चैतन्‍य अवस्‍था में रहें।

अहंकार

अहंकार व्‍यक्ति का एक ऐसा दुर्गुण है, जो उसे प्रगति की अपनेक्षा अवसान के मार्ग पर ले जाता है। व्‍यक्तिगत जीवन का सुख-चैन, अहंकार के कारण समाप्‍त हो जाता है। अहंकार से दूसरे व्‍यक्ति तो बाद में प्रभावित होते हैं, सबसे पहले वह स्‍वयं इससे दुष्‍प्रभावित होकर, सामाजिक, आर्थिक, रानैतिक एवं आध्‍यात्मिक क्षेत्र में पिछड़ जाता है। अहंकारी व्‍यक्ति को लोग पसन्‍द नहीं करते।

अहंकार व्‍यक्ति के सोचने एवं कार्म करने की क्षमता पर प्रभाव डालता है। अहंकारी व्‍यक्ति के सोचने एवं कर्म करने की क्षमता पर प्रभाव डालता है। अहंकारी व्‍यक्ति की सोच नकारात्‍मक होती है। वह स्‍वयं को बहुत बुद्धिमान समझता है। दूसरों की बातें सुनना एवं उन पर ध्‍यान देना तक उचित नहीं समझता है। जिस व्‍यवसाय या कार्यालय में वह काम करता है, वहाँ लोग उससे दूर रहना ही पसन्‍द करते हैं। अहंकार एक ऐसा दुर्गुण है, जो आपके व्‍यक्ति‍त्‍व को नकारात्‍मक रूप से प्रभावित करता है। अहंकार के कारण अन्‍य कई दुर्गुण; जैसे- क्रोध, ईर्ष्‍या और बदले की भावना आपके व्‍यक्तित्‍व में प्रवेश कर जाते हैं। स्‍वयं की काबिलियत पर गर्व करना, आत्‍मविश्‍वासी होना एक बहुत अच्‍छी बात है, लेकिन आप दूसरों की शख्सियत को अपनी काबिलियत के कारण नकारते हैं, तो यह आपका अहंकार है।

अहंकार आपकी सफलता की राह में ऐसी बाधा है, जो शनै:-शनै: आपको अवसान के गर्त में गिराती है।

एक बेहतरीन इन्‍सान अपनी जुबान से ही पहचाना जाता है, वरना अच्‍छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती हैं।

निर्णय में विलम्‍ब एवं टालूपन

वहुत से व्‍यक्ति, जब भी कोई निर्णय लेना हो, किसी नए कार्य को प्रारम्‍भ करना हो, तो बहुत विलम्‍ब करते हैं, टालते रहते हैं, आज-कल, आज-कल करके समय पास करते जाते हैं। ऐसे व्‍यक्ति निर्णय लेने से घबराते हैं, इनमें आत्‍मविश्‍वास की बहुत कमी पाई जाती है। ऐसे लोग हमेशा, दूसरों द्वारा निर्णय लिए जाएँ, ऐसा प्रयास करते है। जब आप किसी अन्‍य के यहाँ नौकरी कर रहे हैं या किसी सरकारी नौकरी में हैं, तो ऐसा चल जाता है, क्‍योंकि आपका व्‍यक्तिगत नुकसान नहीं हो रहा है, लेकिन यदि आपका स्‍वयं का कोई व्‍यवसाय है या आप कोई प्रोफेशनल हैं, तो विलम्‍ब करना या टालूपन की आदत आपकी सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

निर्णय लेने में देरी या किसी कार्य को टालना, इसके कई कारण हो सकते हैं

  1. आपको समझ नहीं आ रहा कि समस्‍या क्‍या है, इसलिए आप उस पर किसी अन्‍य से या अपने सहकर्मी या बॉस से चर्चा नहीं करके, अपनी कमजोरी को छुपाते हुए, बस निर्णय को टालते हैं या विलम्‍ब करते हैं।
  2. आपको भय है कि कहीं निर्णय गलत न हो जाए। इस भय के कारण आप निर्णय लेने से कतराते हैं।
  3. आप किसी को परेशान करने के कारण कोई निर्णय नहीं लेना चाहते हैं।

ध्‍यान रखें निर्णय में विलम्‍ब करना, किसी भी कार्य को टालना, आपकी सफलता के मार्ग को अवरुद्ध करता है। यह आपके व्‍यक्तित्‍व को भी प्रभावित करता है। जो व्‍यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है, उसे इस आदत को बदलना आवश्‍यक है। गलती होने कबे डर से निर्णय नहीं लेने से अच्‍छा है निर्णय लें एवं गलती हो जाए, तो उसका निराकरण करें। गलती से आप बहुत कुछ सीखते हैं। गलती करने से आपके अनुभवों को जो परिपक्‍वता मिलती है, वह आपकी सफलता का र्मा प्रशस्‍त करती है।

इसी प्रकार यदि आप किसी निर्णय के सम्‍बन्‍ध में नहीं समझ रहे हैं, तो उस पर अपने सहकर्मियों से, अपने उच्‍चधिकारियों से विचार करें, उनकी राय लें एवं फिर निर्णय करें, लेकिन इस कारण निर्णय में विलम्‍ब अनुचित होगा। वस्‍तुत: टालूपन एवं विलम्‍ब, न केवल आपके व्‍यक्तित्‍व विकास में आधा है, बल्कि सफलता के मार्ग की बड़ी अड़चनें हैं।

”इच्‍छाशक्ति कल्‍पवृक्ष के समान है, जो आपको हर वो चीद दे सकती है, जिसकी आप कल्‍पना करते हैं।”

क्रोध

क्रोध व्‍यक्ति का ऐसा दुर्गुण है, जो कब विकराल रूप धारण कर ले, पता नहीं चलता और पल भर का क्रोध आपके भविष्‍य को बर्बाद कर सकता है। क्रोध वस्‍तुत: एक नकारात्‍मक एवं तनावपूर्ण स्थिति में एक ऐसी मानसिक संवेगात्‍मक प्रतिक्रिया है, जो कई बार अनियन्त्रित होने पर, न केवल किसी व्‍यक्ति को, बल्कि किसी भी परिवार, समय या राष्‍ट्र को बर्बादी के कगार पर पहुँचा सकती है।

क्रोध में व्‍यक्ति अपने वास्‍तविक रूप को खो देता है और ऐसा कृत्‍य कर देता है, जिसका कोई भी पछतावा उसे वापस नहीं कर सकता। क्रोध की अवस्‍था में मनुष्‍य हिंसात्‍मक और आक्रामक हो जाता है। बुद्धि और विवेक उसे समय असक्षम हो जाते हैं। व्‍यक्ति को पता नहीं होता कि वह क्‍या कर रहा है। क्रोध का आवेश न केवल उस व्‍यक्ति को नुकसान पहुँचाता है जिस पर क्रोध आया है, बल्कि क्रोध करने वाले व्‍यक्ति पर भी इसका भयानक दुष्‍प्रभाव पड़ सकता है।

क्रोध से सिरदर्द, मानसिक असन्‍तुलन, ब्‍लडप्रेशर एवं हार्ट अटैक जैसी अनेक बीमारियाँ जन्‍म ले सकती हैहैं। सफलता की आकांक्षा रखने वाले व्‍यक्ति को क्रोध पर नियन्‍त्रण रखने की अहम् आवश्‍यकता होती है। मानव के व्‍यक्तित्‍व का यह दुर्गुण, आपकी सारी अभिलाषाओं को एक पल में धूल में मिला सकता है। अच्‍छे-भले सुचारु रूप से चलते हुए व्‍यवसाय में क्रोध की एक चिंगारी, कुछ भी करा सकती है। बड़े-बड़े प्रतिष्‍ठानों में हड़ताल, तालाबन्‍दी, मार-पीट तथा अच्‍छे प्रबन्‍धकों का त्‍यागपत्र जैसी घटनाएँ अधिकांशतया ‘क्रोध’ का ही दुष्‍परिणाम हैं।

क्रोध आने के बहुत से कारण हो सकते हैं; जैसे–

व्‍यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक या स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याएँ, लेकिन क्रोध का परिणाम विपदाएँ, कठिनाईयाँ और परेशानियों को ही जन्‍म देता है।

सफलता के मार्ग पर चलने वाले हर व्‍यक्ति को क्रोध को नियन्‍त्रण में रखने की कला आनी ही हचाहिए। क्रोध आने पर कोई भी निर्णय नहीं करें। धैर्य रखें, संयम से काल लें। वहाँ से उठकर चल दें। पानी पिएँ। थोड़ा घूम लें, ईश्‍वर का ना लें। कैसे भी, अपना ध्‍यान उस परिस्थिति से हटाकर नॉर्मल होने का प्रयास रकें। थोड़ी देर रेस्‍ट किया जा सकता है, जो भी क्रिया आपको ठीक लगे, वह करें, लेकिन क्रोध पर नियन्‍त्रण बहुत अहम् हैं।

तामसिक खाना, एल्‍कोहॉल का प्रयोग, धूम्रपान का प्रयोग, तम्‍बाकू का प्रयोग करने वालों को बहुत क्रोध आता है, जबकि जो व्‍यक्ति सात्विक खाना खाता है, फल, सलाद, इत्‍यादि का अधिक सेवन करता है, कोलेस्‍ट्रॉल को सन्‍तुलन में रखता है, वह क्रोध को नियन्‍त्रण में रखने में सफल होता है एवं यह तथ्‍य है कि जो व्‍यक्ति प्रतिदिन योग, प्राणायाम करता है उसे बहुत कम क्रोध आता है। अत: कुछ समय योग, प्राणायाम हेतु देने का प्रयास करें, सफलता मिलेगी।

”क्रोध विष है, क्षमा अमृत है कुटिलता विष है, सरलता अमृत है कपट विषय है, सच्‍चाई अमृत है विषय-भोग विष है, त्‍याग संयम अमृत है।”

ईर्ष्‍या

ईर्ष्‍या प्रत्‍येक व्‍यक्ति में पाई जाने वाली ऐसी मानसिक वृत्ति है, जो किसी अन्‍य व्‍यक्ति को प्रगति करते हुए, सफल होते हुए, ऐश करते हुए देखकर मन में पैदा होती है। यह व्‍यक्ति के मन की भावनात्‍मक दुर्बलता या कमजोरी है, जो थोड़ी-बहुत हर व्‍यक्ति में पाई जाती है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति स्‍वयं को ही सबसे श्रेष्‍ठ प्रदर्शित करना चाहता है, इसके लिए वह प्रयास भी करता है, लेकिन जब वह अन्‍य किसी साथी, सहकर्मी, पड़ोसी, नतेदार-रिश्‍तेदार को स्‍वयं से अधिक प्रति में, मौज-मस्‍ती में, सफल होते हुए देखता है, तो मन में जो विकृत भाव उठते हैं वह ईर्ष्‍या-द्वेष है।

ईर्ष्‍यालु व्‍यक्ति की मानसिक वृत्ति ऐसी होती है कि वह किसी अन्‍य को सुखी, सम्‍पन्‍न, प्रगति करते हुए देखकर, उससे प्रे‍रणा नहीं लेता, बल्कि वह उससे ईर्ष्‍या करने लगता है। ईर्ष्‍या एक ऐसी विकृति है, जो पहले व्‍यक्ति को स्‍वयं को जलाती है बाद में वह दूसरों को नष्‍ट करती है। जैसे माचिस की तीली पहले स्‍वयं जलती है फिर दूसरों को जलाती है, वैसे ही ईर्ष्‍या की प्रवृत्ति होती है।

प्रचलित कहानी है कि किसी गॉंव में एक व्‍यक्ति लँगड़ा था, सब उसे लँगड़ा कहकर चिढ़ाते थे। वह दु:खी था। एक बार एक सिद्ध महात्‍मा उस गॉंव में आए, तो उस व्‍यक्ति ने कहा कि महाराज सब लोग मुझे लँगड़ा कहकर चिढ़ाते हैं। साधु ने उससे पूछा कि वह क्‍या चाहता है? उस व्‍यक्ति ने जवाब दिया कि आप सभी को लँगड़ा बना दो, उसने स्‍वयं के ठीक होने की नहीं, बल्कि उन्‍य सभी को लँगड़े हो जाने की कामना की। वह व्‍यक्ति स्‍वयं के दु:ख से दु:खी नहीं, लेकिन अन्‍य के सुख से दु:खी था। यह प्रवृत्ति होती है ईर्ष्‍यालु व्‍यक्ति की। ईर्ष्‍या व्‍यक्तित्‍व की ऐसी कमजोरी है, जो आपको सफलता की राह में आगे बढ़ने को प्रेरित नहींकरती, बल्कि अन्‍य को आगे बढ़ते देखकर आपको दु:खी करती है।

जो व्‍यक्ति जीवन मे आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्‍हें अपने लक्ष्‍य पर फोकस करते हुए, सकारात्‍मक सोच के साथ, अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करते हुए, सफलता की राह में अग्रसर होना चाहिए, न कि किसी की प्रगति से जलना चाहिए।

जीवन में सफलता आपकी सोच पर निर्भर करती है। दूसरों से कुढ़ने-जलने वाले कभी सफल नहीं होते। हॉं! आप दूसरों की ग्रगति से प्रेरित हों, उनसे अच्‍छा करने की सोचें, अपनी सोच सकारात्‍मक रखें, स्‍वयं की योग्‍यता, क्षमता पर विश्‍वास रखें, सफलता अवश्‍य मिलेगी।

सामने हो मंजिल तो रास्‍ते मत मोड़ना, जो भी हो मन में वो सपना ना तोड़ना, कदम-कदम पे मिलेंगी मुश्किलें आपको सितारे छूने के लिए, कभी ज़मीन न छोड़ना।”

हीन भावना

हीन भावना का अर्थ है स्‍वयं को दूसरों से कमतर समझना, ही समझना, छोटा समझना, कम समझदार समझना या दूसरों को स्‍वयं से ज्‍यादा श्रेष्‍ठ समझना या दूसरों के व्‍यक्तित्‍व के समक्ष स्‍वयं को बौना या हीन समझना। हीन भावना अर्थात् स्‍वयं पर विश्‍वास या आत्‍मविश्‍वास में कमी। सफलता के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण आवश्‍यकता है- स्‍वयं पर विश्‍वास, स्‍वयं की योग्‍यता, क्षमता पर विश्‍वास। यदि आप हीन भावना से ग्रस्‍त हैं, तो आपका सफल होना लगभग असम्‍भव है।

हीन भावना क्‍यों?

दूसरा व्‍यक्ति कितना ही सम्‍पन्‍न दिखाई दे रहा है। वह कितना ही योग्‍य होगा।आपको अपने व्‍यक्तित्‍व को उसके आगे कमतर या बौना समझने की क्‍या आवश्‍यकता है। हर व्‍यक्ति में अपनी कुछ विशेषताऍं होती हैं।अधिकांशतया जैसा कोई दिखाई देता है, वैसा वास्‍तव में, वह होता नहीं है। ”हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती” यह सही कहावत है। फिर हमें दूसरे से क्‍या मतलब।

हमें आगे बढ़ने के लिए, स्‍वयं की मेहनत पर विश्‍वास करना है, स्‍वयं की योग्‍यता, क्षमता के अनुसार, अपनी बुद्धि व विवेक से आगे बढ़ना है। हम दूसरों को सफल होते देख या दूसरों की समृद्धि को देखकर स्‍वयं को हीन क्‍यां समझें?

यदि आप दूसरेां की परिस्थितियों की, अपनी परिस्थितियों से तुलना करेंगे, तो आप पा सकते हैं कि आप जितना संघर्ष व कड़ी मेहनत करके आगे बढ़े हैं, ऐसी परिस्थितियॉं यदि दूसरे व्‍यक्ति के समक्ष आऍं, तो वह तौबा कर ले।

अत: अपनी खूबियॉं, अपनी विशेषताऍं, अपने आन्‍तरिक गुणों को कम नहीं समझें और पूरे आत्‍मविश्‍वास से आगे बढ़ें। हीन भावना को मन से निकाल फेंके।किसी की शक्‍ल, सूरत या पर्सनॉलिटी सफलता का मापदण्‍ड नहीं, बल्कि जो व्‍यक्ति पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ्‍ज्ञ, दृढ़ इच्‍छाशक्ति के साथ, अपनी क्षमताओं का उपयोग, सकारात्‍मक सोच लिए लक्ष्‍य संधारण हेतु आगे बढ़ता है, सफलता उसका वरण करती है।

”छोटी-सी चींटी आपके पैर को काट सकती है, लेकिन आप उसके पैर को नहीं काट सकते, इसलिए जीवन में, किसी को छोटा मत समझो वह जो कर सकता है, शायद आप न कर सको।”

चिन्‍ता

प्रत्‍येक बुद्धिजीवी व्‍यक्ति के साथ चिन्‍ता जुड़ी ही रहती है। थोड़ी-बहुत चिन्‍ता होना एक स्‍वाभाविक सी बात है, लेकिन यदि चिन्‍ता आपके स्‍वास्‍थ्‍, सोचने की शक्ति या निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करे, तो यह खतरनाक स्थिति होती है। वस्‍तुत: जब मन में नकारात्‍मक विचारों का उदय होता है और इन विचारों का मन्‍थन, मस्तिष्‍क द्वारा लगातार किए जाने से, मस्तिष्‍क की ऊर्जा का व्‍यय एक प्रवाह में होता है, तो यह एक खतरनाक स्थिति है।

अधिकांश चिन्‍ता हमारी स्‍वयं की आशंकाओं का परिणाम है। जब किसी निर्णय या कार्य के परिणाम कि दिशा निश्चित नहीं होती है, तो मन विभिन्‍न्‍ प्रकार की आशंकाओं एवं भय से घिर जाता है। कई बार परिस्थितियॉं अकारण प्रतिकूल हो जाती हैं या हो जाने का भय हो जाता है, तो असफलता की आशंका मन को घेर लेती है। सफलता की राह में यह सब होता ही है। प्रश्‍न है कि ऐसी परिस्थिति में क्‍या करना चाहिए? यह बात अच्‍छी तरह से, हर सफलता के राही को समझ लेनी चाहिए कि सफलता का सफर, कठिनाइयों भरा सफर है, इसमें कॉंटे हैं, विषमताऍं हैं, आशंकाऍं हैं, लेकिन इसमें घबराने की कोई आवश्‍यकता नहीं है। न इन परिस्थितियों को स्‍वयं पर हावी होने देने की आवश्‍यकता है।

जिस व्‍यक्ति का मन शंका, चिन्‍ता एवं असफलता के भय से भयभीत हो, वह साधारण-से-साधारण कार्य भी सही तरीके से नहीं कर पाएगा। उसे सफल होने के लिए, चिन्‍ता की नहीं सकारात्‍मक चिन्‍तन की अावश्‍यकता है। चिन्‍तन करें,समस्‍या को समझें, उसका निदान करने का प्रयास करें। यदि आप सकारात्‍मक रूप से किसी भी सन्‍दर्भ में चिन्‍तन करते हैं, तो राह निकल ही आती है। चिन्‍तन कभी निष्‍फल एवं व्‍यर्थ नहीं जाता, जबकि चिन्‍ता आपको असफलता के गर्त में धकेलती है। कहते हैं कि चिन्‍ता आपको असफलता के गर्त में धकेलता है। कहते हैं कि चिन्‍ता एंव चिन्‍तन दोनों भाई हैं। चिन्‍ताग्रस्‍त व्‍यक्ति हमेशा आशंकाओं में जीता है, असफल होता है, जबकि जो व्‍यक्ति चिन्‍तन करता है, वह बड़ी से बड़ी समस्‍या को हल कर सकता है एवं जीवन में सफलता की बुलन्दियोंको छूता है।

एक जोकर ने लोगों को एक जोक सुनाया, सब लोग बहुत हँसे, उसने वही जोक दुबारा सुनाया, तो कम लोग हँसे, उसने वही जोक फिर सुनाया, तो कोई नहीं हँसा, फिर उसने एक बहुत प्‍यारी सी बात बोली, अगर तुम एक खुशी को लेकर, बार-बार खुश नहीं हो सकते हो, तो एक बम/चिन्‍ता को लेकर बार-बार दु:खी क्‍यों होते हो।”

तनाव

आज के इस प्रतिस्‍पर्द्धात्‍मक युग में, पूर्णरूप से तनावमुक्‍त जीवन जीना एक कपोल कल्‍पना से अधिककुछ भी नहीं है। सफलता के राही के लिए, एक कर्मठ व्‍यक्तित्‍व के लिए कुछ हद तक तनाव होना एक आवश्‍यकता भी है। तनाव जब एक स्‍तर/सीमा तक होता है, तो व्‍यक्ति उसे सहन कर सकता है, लेकिन जब तनाव एक सीमा से अधिक हो जाता है, तो व्‍यक्ति का मानसिक सन्‍तुलन बिगड़ सकता है। उसे कई प्रकार के मनोरोग- जैसे- अवसाद, हिस्‍टीरिया, माइग्रेन इत्‍यादि हो सकते हैं। तनावग्रस्‍त व्‍यक्ति जीवन में भयभीत-ास रहता है। आत्‍मविश्‍वास टूट जाता है। चिन्‍ताऍं घेर लेती हैं। कोई सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हो पाता है। हर कार्य को टालने की प्रवृत्ति बनती जाती है। बात-बात में चिड़चिड़ापन एवं गुस्‍सा आता है। तनाव वस्‍तुत: सफलता की राह की बहुत बड़ी बाधा है।

तनाव से कैसे बचें ?

तनाव से बचने के लिए आपकेा तनाव के कारणों का पता लगाकर, तद्नुसार आवश्‍यक कदम उठाने की आवश्‍यकता है। सामान्‍य रूप से तनाव का कारण अनावश्‍यक चिन्‍ताहै, आशंकाओं का भय होता है। इसके लिए हमने बनाया है कि चिन्‍ता की जगह व्‍यक्ति को चिन्‍तन-मनन करना चाहिए एवं अपनी शंकाओं व समस्‍याओं का समाधान ढूँढना चाहिए।

तनाव से बचने हेतु कुछ प्सि/तरीके निम्‍न हो सकते हैं

  1. कार्य के प्रति एवं जीवन के प्रति आशावादीएवं सकारात्‍मक रुख रखने से कठिन समय में भी आप सफल हो सकते हैं।
  2. काम का अम्‍बार लग जाना भी तनाव का बहुत बड़ा कारण हो सकता है। काम को टालने की प्रवृत्ति छोड़ें। आज का काम आज ही निपटाने का प्रयास करें।
  3. यदि तनाव का कारण आर्थिक है, तो अपने व्‍यवसाय को उतना ही बढ़ाएँ, जितने वित्‍त की व्‍यवस्‍था आप आराम से कर सकते हैं। धन की आपा-धापी से बहुत अधिकतनाव होता है।
  4. अपनी समस्‍याओं/चिन्‍ताओं को अपने निजी मित्रों और परिवार के सदस्‍यों से शेयर करने से तनाव में बहुत कमी आती है।
  5. जीवन में गतिशील रहें, जीवन्‍त रहें, जीवन में हास्‍य पैदा करें। उदासीन, हमेशा चिन्‍ता में डूबे रहने, निराशा में, तनाव में वृद्धि होती है।
  6. चाय, कॉफी, एल्‍कोहॉल की अपेक्षा, फलों का जूस और नींबू की शिकंजी का सेवन करने से भी तनाव में कमी आती है। कार्बोहाइड्रेट के सेवन से मन को शान्ति मिलती है।
  7. इस बात को समझ लें कि चिन्‍ता या तनाव करके, स्‍वास्‍थ्‍य खराब करने का कोई लाभ नहीं है। इससे पूव्र भी आपको आज की जैसी समस्‍याओं से, गम्‍भीर समस्‍याओं से रू-ब-रू होना पड़ा होगा। वे समस्‍याएँ भी समाप्‍त हो गई, ये भी हो जाएँगी।
  8. प्रात: जल्‍दी उठें एवं योग व प्राणायाम करें। अपने शरीर को प्रतिदिन कम-से-कम एक घण्‍टा दें। आपको बहुत हल्‍कापन महसूस होगा। आप तनावसे मुक्‍त हो जाऍंगे। योग एवं प्राणायाम, तनाव मुक्‍त होने एवं तनाव से लड़ने में भी सहायक होते हैं।

इस आपा-धापी भरे जीवन में कुछ सीमा तक तनाव यद्यपि अपरिहार्य है तथापित तनाव का सबसे अच्‍छा समाधान सर्वशक्तिमान ईश्‍वर के प्रति असीम श्रद्धा एवं आस्‍था की मन:स्थिति में, अपने कत्‍तव्‍यों का सही रूप से पालन करना है। तनाव रहित व्‍यक्ति सामान्‍यतया अपने लक्ष्‍य संधारण में सफल होते हैं।

”हर कार्य समय पर करें, इसी में जीवन की सार्थकता एवं सफलता है। वर्तमानमें विश्‍व में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, समय तेजी से बदल रहा है। जरूरत है, समय को पहचानें एवं उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलें।”

काम वासना

जीवन में सफलता एवं उन्‍नति का आधार सद्विवेक एवं सद्चरित्रता है। वर्तमान में चारों ओर व्‍याप्‍त अश्‍लीलता के कारण आज चरित्रवान बना रहना भी एक तप जैसा कार्यहो गया है। टीवी पर, बेबल पर, हर सीरियल में, इण्‍टरनेट में, लड़के-लड़कियों के पहनावेमें, अखबार मे मैग्‍जीन्‍स में विज्ञापनों में,जिस तरह से अश्‍लीलता परोसी जाती है, उससे आज का न केवल नौजवान वर्ग, बल्कि हर उम्र का व्‍यक्ति का वासना का शिकार सहज ही बन जाता है।

आज काम वासना की पूर्ति हेतु भी जिस तरह से साधनों की सुलभताहै वह हमारे देश में यूरोपियन संस्‍कृति के पदार्पण एवं इसकेस्‍वीकार्य होने का लक्षण है। ऐसे अश्‍लील, निकृष्‍टवातावरण में व्‍यक्ति का मन कुत्सित होना सम्‍भव प्रतीत होता है। मन बुरे कर्मो की ओर दौड़ना चाहता है, अन्‍तरात्‍मा एवं उसका विवेक उसे रोकते हैं। इस व्‍दन्‍व्‍द की स्थिति में व्‍यक्ति झूलताहै।इन परिस्थितियों में जो व्‍यक्ति डगमगा जाताहै,वह बर्बादी के गर्त में डूबता जाता है। काम वासनाका ज्‍वर व्‍यक्ति को न केवल स्‍वयं की नजरोंमें बिरा देता है, बल्कि समाज में भी वह धिक्‍कारा जाने लगता है।

आज कितने ही उच्‍चाधिकार, मन्‍त्रीगण, प्रतिष्ठित लोग, अच्‍छे-अच्‍छे परिवारों के बच्‍चे, आज के अश्‍लील वातावरण के शिकार होकर दुष्‍कर्मों में लिप्‍त पाए जाते हैं। उनका भविष्‍य व उनका करियर तबाह हो रहा है। इस बिन्‍दु को शामिल करने का अभिप्राय सफलता की राह पर चलने वाले हर व्‍यक्ति को आगाह करना है कि वर्तमान युग में स्‍वयं को सावधान रखें। अश्‍लीलता के वातावरण में, काम वासना के चक्‍करमें अपने आम को बर्बाद होने से बचाएँ।

आप जीवन को जो कुछ देंगे, गदले में वही पाएँगे और उससे कई गुना अधिक पाएँगे। बुरा करेंगे, निन्‍दा करेंगे, तो उससे कई गुना अधिक आपको मिलेगा और अच्‍छा करेंगे तो भी कई गुना अधिक आपको मिलेगा।

आपने एक कहावत सुनी होगी।

“Do good, find good,

अर्थात् कर भला, तो हो भला।

Do good find better

कर भला, पाओ अधिक भला।‘’

और यह सत्‍य है, आजमाकर देंखें। प्रकृति को आप जितना देते हैं, वह उसे कई गुना करके लौटाती है।

नैराश्‍यपन

नैराश्‍यपन अर्थात् निराशा से ग्रस्‍त होना। सफलता के लिए संकल्पित व्‍यक्ति को किसी भी स्थिति में निराश होने की आवश्‍यकता नहीं है। यह सत्‍य है कि सफलता का मार्ग एक दुर्गम मार्ग है, इसमें बहुत उतार-चढ़ाव है, फिसलन है, कठिनाईयाँ हैं, लेकिन जिसने सफल होने का संकल्‍प कर ही लिया, उसे ऐसी किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए स्‍वयं को तैयार करना पड़ेगा। कहते हैं सफलता के मार्ग में, असफलता रूपी कई पड़ाव आते हैं या सफलता का जन्‍म असफलता की कोख से ही होता है। फिर भी निराशा क्‍यों?

निराश होने से, आपको सफलता नहीं मिल जाएगी। आज जो भी व्‍यक्ति सफलता की श्रेणी में आपको दिखाई पड़ते हैं उन्‍होंने हर प्रकार की विदाएँ व कठिनाईयों का सामना किया जै, बहुत समस्‍याएँ झेली हैं, कई बार असफल भी हुए हैं, लेकिन निराश कभी नहीं हुए। लगातार प्रयासरत् रहे। हर असफलता से कुछ नया सीखा। असफलता व्‍यक्ति की सबसे श्रेष्‍ठ शिक्षिका है।

जीत उसी की होती है, जो बिना निराश हुए, पूरे उत्‍साह से, एृढ़ संकल्पित होकर, अपनी पूरी योग्‍यता, क्षमता का उपयोग करते हुए, अपने लक्ष्‍य संधारण में जुटा रहता है। सफलता उसे ही मिलती है, जो आशावादी है, जिसकी सोच सकारात्‍मक है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य रखकर आगे बढ़ता जाता है। अत: सफलता के इच्‍छुक व्‍यक्ति को निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे जोश एवं उत्‍साह से सफलता के मार्ग पर बढ़ते रहना चाहिए।

”मैं अकेला हूँ, लेकिन फिर भी मैं हूँ। मैं सब कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मैं कुछ तो कर सकता हूँ, और सिर्फ इसलिए कि मैं सब कुछ नहीं कर सकता, मैं वो करने से पीछे नहीं हटूँगा जो मैं कर सकता हूँ।”

आलस्‍य

सफलता एवं कामयाबी का सबसे बड़ादुश्‍मन है- ‘आलस्‍य’। जो व्‍यक्ति समय का महत्‍तव नहीं समझ सकता वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। जो व्‍यक्ति आलस्‍यवश किसी कार्य को नहीं करे या देर से करे या टालता रहे वह जीवन में सफल होने की कल्‍पना करे, यह मात्र कल्‍पना ही है। असफल व्‍यक्ति का सबसे बड़ा मित्र है- आलस्‍य, जबकि सफल होने वाला व्‍यक्ति आलस्‍य को अपने पास भी नहीं भटकने देता।

वर्तमान प्रतिस्‍पर्द्धा के युग में, जब तकनीक का इतना विकास हो चुका है कि जो कार्य पहले एक दिन में किया जाता था, वह आज एक घण्‍टे में पूरा किया जा सकता है तो ऐसी स्थिति में एक आलसी व्‍यक्ति जितना समय अपने आलसी स्‍वभाव के कारण व्‍यर्थ करता है, तो अन्‍य लोग कितने आगे निकल जाएँगे, यह बात बहुत सहल ही समझी जा सकती है।

आलस्‍य एवं दरिद्रता, दोनों सहोदर भाई हैं। दोनों अभिनन मित्र हैं एक के बिना दूसरे को चैन नहीं पड़ता। आलसी व्‍यक्ति समय को व्‍यर्थ करता रहता है। आलसी व्‍यक्ति उन उपलब्धियों व कामयाबियों से हाथ धोता है, जो वह कुछ परिश्रम करने से प्राप्‍त कर सकता है।

सफलता के लिए आवश्‍यक है-कर्मठता। आलस्‍य, कर्मठता का दुश्‍मन है।

मनुष्‍य के जीवन का सबसे मूल्‍यवान खजाना है-‘समय’। विश्‍व की संपूर्ण सम्‍पत्ति से, समय का एक क्षण भी खरीदा नहीं जा सकता। जो व्‍यक्ति आलस्‍यवश समय को व्‍यर्थ करता है उसे जीवन में सफलता की कल्‍पना भी नहीं करनी चाहिए। आलस्‍य से मुक्ति पाना ही, सफलता की ओर व्‍यक्ति का एक अहम् कदम होगा। सफल होना है तो आलस्‍य त्‍यागें।

”हमें भूतकाल (Past Time) के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, न ही भविष्‍य के बारे में चिन्तित होना चाहिए विवेकवान व्‍यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं।”

धोखा एवं बेइमानी

आपने ‘धोखा’ के सम्‍बन्‍ध में निम्‍न कविता (कथन) अवश्‍य सुनी होगी

”दगा (धोखा) किसी का सगा नहीं, यदि किया नहीं तो करके देखो। जिसने जीवन में दगा किया, उसका जाकर के घर देखो।”

अर्थात् दगा या धोखा जो रकता है, वह जीवन में कभी भी उन्‍नति नहीं कर सकता। वह जीवन में हमेशा दरिद्र ही रहता है। उसका विनाश निश्चित ही है।

दगा करने वालों को, दूसरों के साथ बेइमानी करने वालों को अस्‍थायी सफलता मिल सकती है। अस्‍थायी रूप से वे प्रसन्‍न महसूस कर सकते हैं, अस्‍थायी रूप से वे समृद्ध एवं खुश दिखाई दे सकते हैं, लेकिन जीवन में वास्तिविक सुख, वास्‍तविक प्रसन्‍नता उन्‍हें कभी नसीब नहीं हो सकती।

वैसे भी जो व्‍यक्ति किसी दूसरे के विश्‍वास को तोड़ता है, किसी के साथ धोखाधड़ी करता है, बेइमानी करता है, वह कैसे सुख-चैन से जी सकता है? कैसे वह जीवन में खुशी/प्रसन्‍नता पा सकता है? यह शाश्‍वत सत्‍य है कि आप जैसा बोओगे वैसा ही पाओगे। यदि आप किसी के साथ दगा कर रहे हैं, बेइमानी कर रहे हैं, तो आपके साथ भी ऐसा ही होगा।

सफलता की आवश्‍यक शर्त, सही प्रकार से, पूरी ईमानदारी से, पूरी मेहनत से अपने लक्ष्‍य संधारण हेतु मेहनत करना है और दगाबाज एवं बेइमान व्‍यक्ति का कड़ी मेहनत से दूर का भी रिश्‍ता नहीं होता है।

यदि वह कड़ी मेहनत में ही विश्‍वास कर ले, तो उसे दगा करने की तथा बेइमानी करने की जरूरत ही नहीं रहेगी। वास्‍तविक सफलता, वास्‍तविक खुशी, वास्‍तविक समृद्धि, वा‍स्‍तविक मानसिक एवं आत्मिक शान्ति के लिए, स्‍वयं एवं पूरे परिवार के सुख के लिए कभी भी किसी के साथ दगा नहीं करनी चाहिए तथा बेइमानी नहीं करनी चाहिए।

”इस तरह ना कमाओ कि पाप हो जाए। इस तरह ना खर्च करो कि कर्ज हो जाए। इस तरह ना खाओं कि मरज हो जाए। इस तरह ना बोलो कि कलेश हो जाए।”

बुरी आदतें

जैसे-जैसे इन्‍सान बचपन से बड़ा होकर जवानी में कदम रखता है, अपने पैरों पर खड़ा होता है या माता-पिता के नियन्‍त्रण से बुछ आजाद होता है बैसे-वैसे कुछ बुरी आदतें, वह अपने मित्रों की नकल करके या जिज्ञासावश पकड़ लेता है !

इन आदतों से आपका स्‍वाभिमान, आत्‍मसम्‍मान एवं आत्‍मगौरव क्षीण होता है। आप कोई भी कार्य पूरे मन से, पूर्ण समर्पण से नहीं कर पाते हैं। व्‍यक्ति इन आदतों का गुलाम हो जाता है। लक्ष्‍य के प्रति पूर्ण फोकस करके अपनी ऊर्जा शक्ति को लगाना सम्‍भव नहीं हो पाता है। 

बहुत सरल बात है, ये बुरी आदतें आपको सफलता से दूर करती हैं। जो व्‍यक्ति जीवन में सफलता की बुलंदियाँ छूना चाहता है, उसे ऐसी आदतों से स्‍वयं को बचाना चाहिए।

”तुम पानी जैसे बनो जो अपना रास्‍ता खुद बनाता है, पत्‍थर जैसे ना बनना, वह दूसरों का रास्‍ता भी रोक देता है।”

प्रतिशोध

प्रतिशोध वस्‍तुत: किसी अन्‍य द्वारा हमें पहुँचाई गई क्षति का प्रतिकार है। कोई व्‍यक्ति हमें क्षति पहुँचाता है, तो हमारे मन में उसे क्षति पहुँचाने की इच्‍छा या भावना ही प्रतिशोध है। यह क्रोध जनित भावना है। क्रोध का संबंग अधिकांशतया क्षणिक होता है, लेकिन प्रतिशोध सामान्‍यतया लम्‍बी प्रक्रिया है, जो सोच-समझकर, दूसरों को क्षति पहुँचाने का उपक्रम है। प्रतिशोध अर्थात् दूसरों को क्षति पहुँचाकर स्‍वयं का सन्‍तुष्‍ट होना है। लेाग समझते है कि यह बड़ी वीरता की बात है, साहस की बात है। क्षत्रियों के लिए, शूरवीरों के लिए, देश के सैनिकों के लिए, यह सब मान्‍य है, लेकिन सफलता की आकांक्षा रखने वाले व्‍यक्ति के लिए प्रतिशोध की धारणा एकदम अनुचित है।  

प्रतिशोध हेतु लगने वाला समय, ऊर्जा, धन एवं मानसिक शक्ति एक तरह से अपव्‍यय है। जो ऊर्जा शक्ति सफलता का लक्ष्‍य हासिल करने के लिए प्रयुक्‍त होनी चाहिए थी, वह प्रतिशोध लेने में प्रयुक्‍त हो रही है।

इसके अतिरिक्‍त निम्‍न बातों पर गौर करें

  • प्रतिशोधी हमेशा इस बात से भयभीत रहता है कि मेरा अहित भी हो सकता है।
  • वह मानसिक रूप से कमजोर होता जाता है।
  • जिन लोगों के मध्‍य वह स्‍वयं को साहसी, वीर एवं बहादुर साबित करना चाहता है, वे ही पीठ के पीछे उसे बेवकूफ, नासमझ एवं तरह-तरह की उपमाओं से परिभाषित करते हैं।
  • प्रतिशोध का प्रतिकार यदि प्रतिशोध से हो जाता है, तो सारा जीवन इसी प्रकार के उपक्रम में निकल जाता है। सब कुछ तबाह एवं बर्बाद हो जाता है और सबसे प्रमुख बिन्‍दु यह है कि प्रतिशोध साहसिक कार्य नही है। वास्‍तविक साहस तो क्षमा करने में है, सहन करने में है। सहनशीलता व्‍यक्ति के आन्‍तरिक गुणों को विकसित करती है, उसे विचारवान बनाती है, उन्‍नति के मार्ग को प्रशस्‍त करती है तथा मित्रवत् माहौल व्‍याप्‍त होता है।
  • जो ऊर्जा प्रतिशोध में व्‍यर्थ हो रही थी, वह सकारात्‍मक कार्यों में लगती है। व्‍यक्ति उल्‍लासपूर्ण एवं भयहीन होकर सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है। अन्‍त:करण शीतल होता है। सफलता की राह पर कदम रखने वाले कर्मठ व्‍यक्तित्‍व को प्रतिशोध से हर हालत में परहेज करना चाहिए।

”कुछ लोग कोयले की तरह होते हैं, जब कोयला गर्म होता है, तो हाथ जलाता है, जब ठण्‍डा होता है, तो कालिख लगाता है।”

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Nitin Gupta

My Name is Nitin Gupta और मैं Civil Services की तैयारी कर रहा हूं ! और मैं भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश से हूँ। मैं इस विश्व के जीवन मंच पर एक अदना सा और संवेदनशील किरदार हूँ जो अपनी भूमिका न्यायपूर्वक और मन लगाकर निभाने का प्रयत्न कर रहा हूं !!

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